Man Ka Shor: Hindi Poem on Overthinking
Namaste/Hello doston!
कभी-कभी जब पूरी दुनिया गहरी नींद में सो जाती है, तब हमारे भीतर एक अनचाहा शोर जाग उठता है। "क्या होगा?", "अगर ऐसा ना हुआ तो?"—मिथ्या ख्यालों का यह जाल हमें अपनी ही गढ़ी हुई चिंताओं में कैद कर लेता है। यह कविता उन्हीं पलों की पुकार है, जब मन को अति चिंतन से बाहर निकालकर खुद पर भरोसा रखना सबसे ज्यादा जरूरी होता है।
रात की खामोशी,
और दिमाग में शोर,
क्यों चलता है मन तेरा,
मिथ्या ख्यालों की ओर...
कभी ऐसा ना हो जाए,
कुछ वैसा ना हो जाए,
चुपके से सहता है दिल,
कहीं मज़ाक ना बन जाए।
क्यों इन विचारों के जाल में फंसा,
निकल बाहर, इनमें रखा ही क्या...
जो मुश्किलें आएंगी, उनका सामना कर,
तू मजबूत है इतना, उन्हें हरा कर आगे बढ़।
जो जीवन में लिखा है, वो बदला नहीं जाएगा,
खुद पर भरोसा रख, तू बेशक सफल हो जाएगा।
अति चिंतन में ना उलझ, इससे सिर्फ नुकसान होगा,
बस तू अपने कर्म कर, देख जीना कितना आसान होगा।
जो किस्मत में है तेरी, वो छीना नहीं जा सकता,
और बीती बातों को कभी बदला नहीं जा सकता...
आने वाला कल भला देखा है किसने यहाँ,
अपने हर पल को बेहतर बना, और खुल के जी ये जहाँ!
क्या आप भी कभी देर रात ऐसे ही ख्यालों से जूझते हैं? कमेंट करके ज़रूर बताएं!
Aur meri pichhli kavita ख़ामोशी yahan padhein.
Kuch naye ehsaas likhne ki koshish mein...
Aapki Swati...

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